*मुक्त-मुक्तक : 847 - हमने क्या देखा ?




फ़क़त एक हमने क्या देखा सभी ने ॥
तुम्हें नाखुदा बन डुबोते सफ़ीने ॥
तो ये जान क्यों कोई चाहेगा तुमको,
हो जब इस क़दर धोखेबाज़ और कमीने ॥
(फ़क़त = केवल ,नाखुदा = नाविक ,सफ़ीने = नाव ,कमीने = पातकी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी