*मुक्त-मुक्तक : 846 - बिजलियों की तड़प ॥



फिर से छूने की बारबार उँगलियों की तड़प ॥
देख दीदार की दिनरात पुतलियों की तड़प ॥
मिलके जबसे तू अँधेरों में खो गया मेरी ,
जुस्तजू में है आस्मानी बिजलियों की तड़प ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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