मुक्तक : 845 - मत डरो , मत डरो ॥



इश्क़ को मानते हो अगर ज़ुर्म तो ,
चाहे हो जाए कुछ ,
मत करो , मत करो ॥
मानते हो इबादत , ख़ुदा तो न फिर ,
दुनिया से बेसबब ,
मत डरो , मत डरो ॥
जब न कोई ख़ता , जब न कोई गुनह ,
जाने अनजाने भी
यार करते नहीं ,
फिर कोई लाख माँगे अगर हो सही ,
कोई ज़ुर्माना डर ,
मत भरो , मत भरो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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