*मुक्त-ग़ज़ल : 199 - अपना सा बनाने वाले ॥



मुस्कुराहट को ठहाका सा बनाने वाले ॥
दरिया भर दर्द वो क़तरा सा बनाने वाले ॥
एक हम हैं जो रखें गुड़ भी बनाके गोबर ,
और लोहे को वो सोना सा बनाने वाले ॥
हमने बाग़ों से कली-फूल जो तोड़े-फेंके ,
उनको चुन-चुन के वो गजरा सा बनाने वाले ॥
सिर्फ़ रोतों को हँसाने के बड़े मक़सद से ,
ग़म का क़िस्सा वो लतीफ़ा सा बनाने वाले ॥
हमसे अपने भी गए तोड़ के रिश्ता-नाता ,
दुश्मनों को भी वो अपना सा बनाने वाले ॥
हमने बचपन को सरेआम बनाया बूढ़ा ,
वो बड़े-बूढ़ों को बच्चा सा बनाने वाले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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