*मुक्त-ग़ज़ल : 196 - धोबी-पछाड़ बन बैठे ॥




   तेरी चाहत में यार तिल से ताड़ बन बैठे ॥
   सच में तुलसी से थे पीपल का झाड़ बन बैठे ॥
   ईंट पत्थर की थी दीवार ऊँची-मोटी बस ,
   तेरे आने से खिड़की औ किवाड़ बन बैठे ॥
   चिड़चिड़ाहट के बुत थे , थे बहुत ही गुस्सेवर ,
   तूने चाहा तो धीरे-धीरे लाड़ बन बैठे ॥
   तुझको छुप-छुप दरार में से झाँकने वाले ,
   आज तेरी अपारदर्शी आड़ बन बैठे ॥
   ख़ुद की जीते जी जो जुगत न बन सके तेरी ,
   तेरे मक़सद पे हो क़ुर्बां जुगाड़ बन बैठे ॥
   बस मोहब्बत की कुश्तियों में सब रक़ीबों को ,
   करके चित छोड़े वो धोबी-पछाड़ बन बैठे ॥
   दुश्मनों को तेरे जलाने-भूनने को हम ,
   गाह तंदूर कभी एक भाड़ बन बैठे ॥
   ( बुत = प्रतिमा , गुस्सेवर = क्रोधी , रक़ीबों = अपनी प्रेमिका के       प्रेमी  , गाह = कभी , भाड़ = अनाज भूनने की भट्टी )
    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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