*मुक्त-ग़ज़ल : 195 - छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥


शत्रु हो बैठे मीत की बातें ॥
छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥
दुःख भरे राग छेड़ना छोड़ो ,
बस करो हर्ष-गीत की बातें ॥
हार को भूलभालकर पिछली ,
सोचो अब अगली जीत की बातें ॥
बैरियों से रखो तुम अनबोला ,
अपनों से कीजै प्रीत की बातें ॥
जो नहीं लाभप्रद न अच्छी ही ,
मत निभाओ वो रीत की बातें ॥
कंपकंपातों को आँच-धूप वरो ,
मत करो बर्फ-शीत की बातें ॥
नित्य मल-भक्षकों से मत करना ,
गंगा-जमुना पुनीत की बातें ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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