*मुक्त-ग़ज़ल : 194 - ‘गब्बर’ सा हो गया ॥



फूलों सा मैं यकायक नश्तर सा हो गया ॥
थपकी से एक थप्पड़-ठोकर सा हो गया ॥
माना मैं मोम था कल , मक्खन सा नर्म था ,
कुछ हो गया कि अब मैं पत्थर सा हो गया ॥
शोले का सच में था मैं ठाकुर सा क्या कहूँ ?
शोले का आजकल मैं गब्बर सा हो गया ॥
पहले नहीं थी उसकी आँखों में भी जगह ,
अब दिल-दिमाग़ में भी इक घर सा हो गया ॥
वो मुझसे यों कटे बस लगता है मुझको ये ,
जैसे कोई परिंदा बेपर सा हो गया ॥
रगड़ा गया है मुझको इतना कि खुरदुरे ,
इक रेगमाल से मैं मर्मर सा हो गया ॥
भूकंप इतने झेले मेरे मकान ने ,
है तो नया ही लेकिन जर्जर सा हो गया ॥
पहले नहीं थी इसमें मूरत कोई मगर ,
मस्जिद सा मेरा दिल अब मंदिर सा हो गया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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