*मुक्त-ग़ज़ल : 193 - खूबसूरत हम थे जब ॥




   हमने इक ग़म क्या किया उनसे तलब ॥
   छीन लीं उनने हमारी खुशियाँ सब ॥
   चाहते थे वो चकोरे सा हमें ,
   चाँद जैसे खूबसूरत हम थे जब ॥
   कल लगे थे दुम सरीखे पीछे वो ,
   इक गधे के सींग से ग़ायब हैं अब ?
   वो ये कहते हैं किया कब याद हमें ,
   हम ये कहते हैं कि भूले ही थे कब ?
   उनपे कर बैठे थे दिल-ओ-जाँ निसार ,
   थी कहाँ हममें समझ ? छोटे थे तब ॥
   उनकी आँखें तो ज़ुबाँ से थीं बड़ी ,
   क्या हुआ गर बंद रखते थे वो लब ?
   दिल था सोना , रूह कोहेनूर थी ,
   काश होता पुरकशिश तन का भी ढब !!
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक