*मुक्त-ग़ज़ल : 192 - कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥



गीत एकल गा रहे समवेत हम ॥
कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥
देखकर आकार कोई ना डरे ,
इसलिए पर्वत को कहते रेत हम ॥
दुःख न हो महिषी को बस ये सोचकर ,
उसकी श्यामलता को बोलें श्वेत हम ॥
क्यों न रूठे हाय वर्षा ऋतु अरे ,
कर रहे वन दिन पे दिन सब खेत हम ?
जल नहीं तो कुछ नहीं इस बात को ,
क्यों नहीं अब भी रहे हैं चेत हम ?
निशि-दिवस चिंता चिता के तुल्य है ,
मृत्यु का समझें न ये संकेत हम ॥
मुक्ति निःसन्देह हो अभिप्रेत पर ,
जीते जी सब हो रहे क्यों प्रेत हम ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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