*मुक्त-ग़ज़ल : 191 - फ़िक्र



फ़िक्र , फ़िक्र तंदुरुस्त गब्ज़ फ़िक्र है ॥
हर जुबाँ पे आज एक लफ़्ज़ फ़िक्र है ॥
मुफ़्लिसी किसी की कोई देख रो रहा ,
तो किसी को तक किसी का ख़ब्ज़ फ़िक्र है ॥
स्याह है ,सफ़ेद है या सुर्ख़ जर्द हाँ ,
मग़्ज़ में मगर सभी के सब्ज़ फ़िक्र है ॥
उनको चाहिए नजात अपने दस्त से ,
हमको हाय अपनी सख़्त क़ब्ज़ फ़िक्र है ॥
अपनी ज़िंदगी की बेहतरी को आज हमें ,
आती-जाती साँस चलती नब्ज़ फ़िक्र है ॥
( गब्ज़ = हृष्ट-पुष्ट , मुफ़्लिसी = कंगाली , तक = निहारना , ख़ब्ज़ = ऐश्वर्य , मग़्ज़ = मस्तिष्क )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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