*मुक्त-ग़ज़ल : 190 - बहादुरशाह ज़फ़र



मेह्रबानी करके ये एहसान कर ॥
मेरे मुर्दे में न तू फिर जान भर ॥
ज़िंदगी भर को चले जाना तू फिर ,
पास मेरे बैठ करके आन भर ॥
जबकि रिश्ता उससे था खूँ का मगर ,
ऐसा लगता था कि थी पहचान भर ॥
आस्तीं का साँप है या दोस्त तू ,
मत मेरे बारे में उसके कान भर ?
कबसे आँखें खोलकर सोता हूँ रे ,
नींद आ जाए तू ऐसी तान भर ॥
शेर मत कह , कह ग़ज़ल मेरे लिए ,
एक-दो मत , अनगिनत दीवान भर ॥
ख़ूब इतराते थे चख तर माल कल ,
खा रहे हैं आज सूखी नान भर ॥
इस क़दर काटे गए उससे शजर ,
रह गया जंगल वो अब मैदान भर ॥
उनके दिलबर उनकी औलादों के अब ,
रह गए हैं बनके अब्बाजान भर ॥
रह गए बनकर बहादुरशाह ज़फ़र ,
नाम के राजा हैं झूठी शान भर ॥
( मेह्रबानी करके = कृपया , आन = क्षण , दीवान = विशिष्ट ग़ज़ल संग्रह , नान = रोटी , शजर = पेड़ , दिलबर = प्रेमपात्र )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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