*मुक्त-ग़ज़ल : 189 - उसे कैसे मैं आइसक्रीम कह दूँ ?




सबब कुछ भी नहीं जब , किसलिए फिर बेवजह बोलूँ ?
तुम्हीं बतलाओ कैसे हार को अपनी फ़तह बोलूँ ?
वो इक जलता हुआ सूरज है गर्मी का जो झुलसाता ,
उसे कैसे मैं आइसक्रीम कह दूँ या कि मह बोलूँ ?
हमेशा मैं वही बोला जो सुनना चाहते थे तुम ,
जो कहना चाहता हूँ - आज दिल बोले , मैं वह बोलूँ ॥
बख़ूबी जानता हूँ चाहता है वो मुझे लेकिन ,
मैं उससे – दूसरे को चाहता हूँ , किस तरह बोलूँ ?
मुझे मालूम है , है रेगमाल एहसास उसका पर ,
मैं बेमक़सद न उसको काँच की चिकनी सतह बोलूँ ॥
( बेवजह = अकारण ,मह = चाँद , फ़तह = जीत , रेगमाल = एक अत्यंत खुरदुरा कागज़ , बेमक़सद = निरुद्देश्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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