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Showing posts from June, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 200 - बना बना के बिगाड़ा

लगा के बाग़ उजाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ बना बना के बिगाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ जगाने मुझको तू आया तो बाँग देता मगर , तू कान में ही दहाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ पड़ा ही रहने दिया होता था मैं खंभा अगर , गड़ा के फिर से उखाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ अदू जो मुझको गिराते तो सच न होती कसक , सगे सगों ने पछाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ ख़ता पे मुझको बुज़ुर्गों ने डांट ठीक किया , जो बच्चों ने भी लताड़ा , ये बात ठीक न की ॥ बग़ैर मेरे बुलाए फटे में ये क्या किया ? अड़ा के टाँग कबाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 199 - अपना सा बनाने वाले ॥

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मुस्कुराहट को ठहाका सा बनाने वाले ॥ दरिया भर दर्द वो क़तरा सा बनाने वाले ॥ एक हम हैं जो रखें गुड़ भी बनाके गोबर , और लोहे को वो सोना सा बनाने वाले ॥ हमने बाग़ों से कली-फूल जो तोड़े-फेंके , उनको चुन-चुन के वो गजरा सा बनाने वाले ॥ सिर्फ़ रोतों को हँसाने के बड़े मक़्सद से , ग़म का क़िस्सा वो लतीफ़ा सा बनाने वाले ॥ हमसे अपने भी गए तोड़ के रिश्ता-नाता , दुश्मनों को भी वो अपना सा बनाने वाले ॥ हमने बचपन को सरेआम बनाया बूढ़ा , वो बड़े-बूढ़ों को बच्चा सा बनाने वाले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 198 - तबले की तिरकिट-धा-धिन है ॥

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चाँदी रात है , सोना दिन है ॥ दिल अपना नाख़ुश लेकिन है ॥ तेरे बिन जीना नामुमकिन , फिर भी जीना तेरे बिन है ॥ उससे क्या माँगें जो दाने , ना तोले देता गिन-गिन है ॥ कैसे चूमें-चाटें उसको , हमको आती जिससे घिन है ॥ बस पागल ही इस दुनिया में , दर्द में भी हँसता तासिन है ॥ मेरा पीछा वो मीठे पर , मक्खी सा करता भिन-भिन है ॥ मैं वीणा का पंचम स्वर वो , तबले की तिरकिट-धा-धिन है ॥ तन नाजुक है फूल सा उसका ,

ग़ज़ल : 197 - अच्छा नहीं किया हमने ॥

हाँ ; दवा-दारू , न ज़हराब ही पिया हमने ॥ ज़ख्म बढ़ता ही रहा फिर भी नाँ सिया हमने ॥ इतने तो भूखे रहे हम कि जब मिला पानी , हमने रोटी सा चबाया नहीं पिया हमने ॥ उसने वो बेच दिया अपने फ़ायदे भर को , बेच ख़ुद को जो उसे तोहफा दिया हमने ॥ फ़ौज में आए हैं हम रोज़गार को सच-सच , ठेका मरने का वतन पे नहीं लिया हमने ॥ कल जो हमने था किया एक काम अच्छा ही , आज लगता है वो अच्छा नहीं किया हमने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 196 - पछाड़ बन बैठे ॥

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तेरी चाहत में यार तिल से ताड़ बन बैठे ।।    सच में तुलसी से एक वट का झाड़ बन बैठे ।।1।।    ईंट-पत्थर की थी दिवार ऊँची-मोटी बस ,    तेरे आने से खिड़की औ’ किवाड़ बन बैठे ।।2।।    चिड़चिड़ाहट के बुत थे और ग़ुस्सेवर थे हम ,    तूने चाहा तो धीरे-धीरे लाड़ बन बैठे ।।3।।    तुझको छुप-छुप दरार में से झाँकने वाले ,    आज तेरा ही पर्दा , ओट , आड़ बन बैठे ।।3।।    ख़ुद की जीते जी जो जुगत न बन सके तेरी ,    तेरे मक़्सद पे जान दे जुगाड़ बन बैठे ।।4।।    बस मोहब्बत की कुश्तियों में सब रक़ीबों को ,    करके छोड़े जो चित ही वो पछाड़ बन बैठे ।।5।।    दुश्मनों को तेरे जलाने - भूनने को हम ,    गाह तंदूर गाह एक भाड़ बन बैठे ।।6।।
 ( बुत = प्रतिमा , ग़ुस्सेवर = क्रोधी , रक़ीबों = अपनी प्रेमिका के       प्रेमी  , गाह = कभी , भाड़

ग़ज़ल : 195 - छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥

शत्रु हो बैठे मीत की बातें ॥ छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥ दुःख भरे राग छेड़ना छोड़ो , बस करो हर्ष-गीत की बातें ॥ हार को भूलभालकर पिछली , सोचो अब अगली जीत की बातें ॥ बैरियों से रखो तुम अनबोला , अपनों से कीजै प्रीत की बातें ॥ जो नहीं लाभप्रद न अच्छी ही , मत निभाओ वो रीत की बातें ॥ कँपकँपातों को आँच-धूप वरो , मत करो बर्फ-शीत की बातें ॥ नित्य मल-भक्षकों से मत करना , गंगा-जमुना पुनीत की बातें ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 194 - ‘गब्बर’ सा हो गया ॥

फूलों सा मैं यकायक नश्तर सा हो गया ॥ थपकी से एक थप्पड़-ठोकर सा हो गया ॥ माना मैं मोम था कल , मक्खन सा नर्म था , कुछ हो गया कि अब मैं पत्थर सा हो गया ॥ ‘शोले’ का सच में था मैं ‘ठाकुर’ सा क्या कहूँ ? ‘शोले’ का आजकल मैं ‘गब्बर’ सा हो गया ॥ पहले नहीं थी उसकी आँखों में भी जगह , अब दिल-दिमाग़ में भी इक घर सा हो गया ॥ वो मुझसे यों कटे बस लगता है मुझको ये , जैसे कोई परिंदा बेपर सा हो गया ॥ रगड़ा गया है मुझको इतना कि खुरदुरे , इक रेगमाल से मैं मर्मर सा हो गया ॥

मुक्तक : 847 - हमने क्या देखा ?

फ़क़त एक हमने क्या देखा सभी ने ॥ तुम्हें नाखुदा बन डुबोते सफ़ीने ॥ तो ये जान क्यों कोई चाहेगा तुमको, हो जब इस क़दर धोखेबाज़ और कमीने ॥ (फ़क़त = केवल ,नाखुदा = नाविक ,सफ़ीने = नाव ,कमीने = पातकी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

अतिथि विद्वानों की दशा

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मध्यप्रदेश में वर्षों से शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत अतिथि विद्वानों की दशा का यथार्थ चित्र ! 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

ग़ज़ल : 193 - खूबसूरत हम थे जब ॥

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हमने इक ग़म क्या किया उनसे तलब ॥    छीन लीं उनने हमारी खुशियाँ सब ॥    चाहते थे वो चकोरे सा हमें ,    चाँद जैसे खूबसूरत हम थे जब ॥    कल लगे थे दुम सरीखे पीछे वो ,    इक गधे के सींग से ग़ायब हैं अब ?    वो ये कहते हैं किया कब याद हमें ,    हम ये कहते हैं कि भूले ही थे कब ?    उनपे कर बैठे थे दिल-ओ-जाँ निसार ,    थी कहाँ हममें समझ ? छोटे थे तब ॥    उनकी आँखें तो ज़ुबाँ से थीं बड़ी ,    क्या हुआ गर बंद रखते थे वो लब ?    दिल था सोना , रूह कोहेनूर थी ,    काश होता पुरकशिश तन का भी ढब !!

मुक्तक : 846 - बिजलियों की तड़प ॥

फिर से छूने की लगातार उँगलियों की तड़प ॥ देख दीदार की दिनरात पुतलियों की तड़प ॥ मिलके जबसे तू अँधेरों में खो गया है मेरी , जुस्तजू में है चमकदार बिजलियों की तड़प ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 192 - कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥

गीत एकल गा रहे समवेत हम ॥ कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥ देखकर आकार कोई ना डरे , इसलिए पर्वत को कहते रेत हम ॥ दुख न हो महिषी को बस ये सोचकर , उसकी श्यामलता को बोलें श्वेत हम ॥ क्यों न रूठे हाय वर्षा ऋतु अरे , कर रहे वन दिन पे दिन सब खेत हम ? जल नहीं तो कुछ नहीं इस बात को , क्यों नहीं अब भी रहे हैं चेत हम ? निशि-दिवस चिंता चिता के तुल्य है , मृत्यु का समझें न ये संकेत हम ॥ मुक्ति निस्सन्देह हो अभिप्रेत पर , जीते जी सब हो रहे क्यों प्रेत हम ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति