*मुक्त-मुक्तक : 836 - पानी पर से हाथी

जैसे पानी पर से हाथी चल निकल आया ॥
काले पत्थर में से मीठा जल निकल आया ॥
रात-दिन मैं ढूँढता था जिसको मर-मर कर ,
मेरी कठिनाई का ऐसे हल निकल आया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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