*मुक्त-मुक्तक : 834 - तुममें स्वर विध्वंस के ॥

कृष्ण के सब मूक हो वाचाल होते कंस के ॥
उठ रहे हैं धीरे-धीरे तुममें स्वर विध्वंस के ॥
हो गया ऐसा तुम्हारे साथ में क्या दुर्घटित ,
रँग रहे हो काग रँग सब छोड़कर ढंग हंस के ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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