मुक्तक : 832 - जाना है किधर को ?



छूना है शाम को या पकड़ना है सहर को ;
हमको नहीं पता था कि जाना है किधर को ?
जब तक थे पाँँव चलते रहे , चलते रहे हम ,
कटने के बाद भी था रखा जारी सफ़र को ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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