*मुक्त-मुक्तक : 830 - नाग की तरह ॥

डसती थी याद दिल को स्याह नाग की तरह ॥
जलता था तन ये जंगलों की आग की तरह ॥
तेरे बिना थी ज़िंदगी बग़ैर आब की ,
इक अंधी बावड़ी , बड़े तड़ाग की तरह ॥
( स्याह=काला ,बग़ैर आब की=जल विहीन ,अंधी बावड़ी=सीढ़ीयुक्त बहुत गहरा कुआँ ,तड़ाग=तालाब ,सरोवर )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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