गीत : 43 - भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥

सूखे पत्तों में जैसे झट से आग लग जाए ।
पतला कागज़ तनिक सी देख लौ सुलग जाए ।
मेरी जितनी भी कामनाएँ थीं ,
भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥
जैसे पानी में होता हाल कच्ची मिट्टी का ।
अश्रु गिरने से अपने प्राण-प्रिय की चिट्ठी का ।
जो लगाती थीं पार मुझको वो ,
सारी नौकाएँ आज गल बैठीं ॥
जैसे कुछ और वो नहीं हों मेरी छाया हों ।
गिरती दीवार को सम्हालता वो पाया हों ।
साथ में बैठती जो घंटों थीं ,
आज मनुहार पे न पल बैठीं ॥
सच में आजन्म का था , था नहीं क्षणिक मुझको ।
जिनपे विश्वास हाँ स्वयं से भी अधिक मुझको ।
मेरे मित्रों के साथ में मिल वो ,
मेरी सखियाँ भी मुझको छल बैठीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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