मुक्त-ग़ज़ल : 189 - उन्ही का ख़्वाब रहे ॥

हम पे प्यासों में भी न क़तरा भर भी आब रहे ॥
उन पे नश्शे में भी सुराही भर शराब रहे ॥
रोशनी को चिराग़ भी नहीं रहे हम पे ,
उनकी मुट्ठी में क़ैद सुर्ख़ आफ़्ताब रहे ॥
जबकि मालूम है कि शर्हा- शर्हा होना है ,
फिर भी आँखों में मेरी बस उन्ही का ख़्वाब रहे ॥
कैसे आए यक़ीं जो आज अपनी हालत है ,
हम कभी इस जहाँ सबसे कामयाब रहे ?
आज सरताज हैं अपने हुनर से हम जिनके ,
पाँव की जूती कभी और कभी जुराब रहे ॥
उनकी ताउम्र नज़र में हम इक ख़ता की वजह ,
अच्छे होकर भी बस ख़राब बस ख़राब रहे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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