*मुक्त-ग़ज़ल : 188 : अल्लाह है ना राम

मीर है ना मिर्ज़ा ग़ालिब नाम मेरा है ॥
हाँ ग़ज़ल हर रोज़ कहना काम मेरा है ॥
मैंने कब सीता चुराई फिर भी रावण सा ,
किसलिए होता बुरा अंजाम मेरा है ?
उनके लब पे प्यास का यों ज़िक्र आया था ,
दे दिया मैंने उठाकर जाम मेरा है ॥
झूठ के दम पर तो मैं आज़ाद फिरता था ,
क़ैद तो सच कहने का इन्आम मेरा है ॥
मैं तो बस इंसानियत को मानता हूँ रब ,
ना मेरा अल्लाह है ना राम मेरा है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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