मुक्त-ग़ज़ल : 188 - कामयाबी

हमने देखा फ़ायदा कुछ भी नहीं तदबीर का ॥
कामयाबी में हमेशा हाथ हो तक़दीर का ॥
बेर जब हमको ज़रूरी हमको मत अंगूर दो ,
जिस जगह अमरूद लाज़िम काम क्या अंजीर का ?
बाँधने उसको चले तुम रेशमी धागा लिए ,
जिसके आगे टूटता दम रस्से का , ज़ंजीर का ॥
नौजवाँ इक रोज़ बूढ़ा तू भी होगा शर्तिया ,
मत मज़ा ले राह चलते कँपकँपाते पीर का ॥
जंगजू की नौकरी करता है वो सरकार की ,
और लगता है उसे डर तीर का , शमशीर का ॥
सब ग़ज़ल कहते रहें ताउम्र लेकिन सच है ये ,
पा न पाएंगे कभी रुतबा वो ग़ालिब - मीर का ॥
( तदबीर = प्रयास , लाज़िम = आवश्यक , पीर = वृद्ध , जंगजू = सैनिक , शमशीर = तलवार )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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