*मुक्त-ग़ज़ल : 187 - इम्तिहाँ

जीवन बिताने पूछ मत कि हम कहाँ चले ?
हर ओर मृत्यु नृत्यरत है हम वहाँ चले ॥
तैयारियाँ तो अपनी कुछ नहीं हैं किन्तु हम ,
देने कमर को कसके सख़्त इम्तिहाँ चले ॥
अगुवा बना लिया है अब तो भाग्य को ही सच ,
जाएँगे उसके पीछे लेके वो जहाँ चले ॥
उनके वहाँ तो पत्ता भी हिले नहीं कभी ,
जब देखो तब ही पाओगे आँधी यहाँ चले ॥
आदत है उसकी वक़्त पे न आए वो कभी ,
तिसपे है शौक सर उठा वो नागहाँ चले ॥
( सख़्त इम्तिहाँ = कठिन परीक्षा , नागहाँ = कुसमय , अचानक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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