Monday, May 30, 2016

मुक्तक : 843 - मेरे खिलते ही




मेरे खिलते ही पूरा मुझको भी तोड़ा जाता ॥
यूँ ही गुलशन में मुझ कली को न छोड़ा जाता ॥
ख़ूबसूरत भी मैं नहीं न हूँ मैं ख़ुशबूदार ,
वर्ना मुझको भी इत्र को न निचोड़ा जाता ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Sunday, May 29, 2016

मुक्तक : 842 - लेना सबक ज़रूर




भूले फटकता था न कभी पास जो मेरे ,
क्यों वक़्त वो निकाल के अब रोज़ ही आता ?
ऐसा नहीं कि उसको मैं अच्छा सा लगे हूँ ,
ये भी नहीं कि उसको मेरा रोब लुभाता !!
हैरत न खाना वज़्ह को आप इसकी समझकर ,
लेना सबक ज़रूर मगर सच ही समझकर ,
जाना है जबसे उसने कि मैं मोम हूँ तो बस ,
कुछ धूप , थोड़ी आँच वो रख साथ में लाता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Saturday, May 28, 2016

ग़ज़ल : 188 ( B) ) : अल्लाह है ना राम



मीर है ना मिर्ज़ा ग़ालिब नाम मेरा है ॥
हाँ ग़ज़ल हर रोज़ कहना काम मेरा है ॥
मैंने कब सीता चुराई फिर भी रावण सा ,
किसलिए होता बुरा अंजाम मेरा है ?
उनके लब पे प्यास का यों ज़िक्र आया था ,
दे दिया मैंने उठाकर जाम मेरा है ॥
झूठ के दम पर तो मैं आज़ाद फिरता था ,
क़ैद तो सच कहने का इन्आम मेरा है ॥
मैं तो बस इंसानियत को मानता हूँ रब ,
ना मेरा अल्लाह है ना राम मेरा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, May 27, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 841 - तलाशना हमें बहारों में ॥



मत खुले में तलाशना हमें बहारों में ॥
ढूँढना पत्थरों के ऊँचे कारागारों में ॥
सिर्फ़ इक भूल का अंजाम भोगने को खड़े ,
हम ख़तरनाक गुनहगारों की कतारों में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, May 26, 2016

मुक्तक : 840 - वो सीधा-सादा सा


वो सीधा-सादा सा टेढ़ी निगाह कर बैठा ॥
शरीफ़ हो के भी ज़ुर्म-ओ-गुनाह कर बैठा ॥
कि अधबने को बनाते बनाते जाने क्यों ,
न करके पूरा वो पूरा तबाह कर बैठा ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, May 23, 2016

मुक्तक : 839 - पाँव की जूती



कल की चीज़ों की अभी की आज की रक्खी ॥
पाँव की जूती की सिर के ताज की रक्खी ॥
कौन सा बाज़ार है ये जिसमे तितली की ,
बेचने वालों ने क़ीमत बाज़ की रक्खी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 22, 2016

मुक्तक : 838 - कबरी बिल्ली हो गए ॥



हम जबलपुर से यकायक सीधे दिल्ली हो गए ॥
एक चूहे से बिफरती कबरी बिल्ली हो गए ॥
मुल्ला नसरुद्दीन थे लेकिन हुआ फ़ुर्सत में यों ,
मन के लड्डू खाते-खाते शेख़चिल्ली हो गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, May 21, 2016

ग़ज़ल : 189 - उन्ही का ख़्वाब रहे ॥



हम पे प्यासों में भी न क़त्रा भर भी आब रहे ।।
उन पे नश्शे में भी सुराही भर शराब रहे ।।1।।
रोशनी को चिराग़ भी नहीं रहे है यहाँ ,
उनकी मुट्ठी में क़ैद सुर्ख़ आफ़्ताब रहे ।।2।।
जबकि मालूम है कि तै है शर्हा होना मगर ,
फिर भी आँखों में मेरी बस उन्हीं का ख़्वाब रहे ।।3।।
देख हालत को अपनी आज कैसे आए यक़ीं ,
हम कभी इस जहाँ में ख़ूब कामयाब रहे ?4।
आज अपने हुनर से उनके सिर के ताज हैं हम ,
जिनके पैरों की गाह जूती औ' जुराब रहे ।।5।।
उनकी नज़रों में तासिन इक ख़ता की वज्ह से हम ,
अच्छे होकर भी बस ख़राब बस ख़राब रहे ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, May 20, 2016

ग़ज़ल : 188 - कामयाबी



हमने देखा फ़ायदा कुछ भी नहीं तदबीर का ॥
कामयाबी में हमेशा हाथ हो तक़दीर का ॥
बेर जब हमको ज़रूरी हमको मत अंगूर दो ,
जिस जगह अमरूद लाज़िम काम क्या अंजीर का ?
बाँधने उसको चले तुम रेशमी धागा लिए ,
जिसके आगे टूटता दम रस्से का , ज़ंजीर का ॥
नौजवाँ इक रोज़ बूढ़ा तू भी होगा शर्तिया ,
मत मज़ा ले राह चलते कँपकँपाते पीर का ॥
जंगजू की नौकरी करता है वो सरकार की ,
और लगता है उसे डर तीर का , शमशीर का ॥
सब ग़ज़ल कहते रहें ताउम्र लेकिन सच है ये ,
पा न पाएंगे कभी रुतबा वो ग़ालिब - मीर का ॥
( तदबीर = प्रयास , लाज़िम = आवश्यक , पीर = वृद्ध , जंगजू = सैनिक , शमशीर = तलवार )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, May 19, 2016

ग़ज़ल : 187 - इम्तिहाँ



जीवन बिताने पूछ मत कि हम कहाँ चले ?
हर ओर मृत्यु नृत्यरत है हम वहाँ चले ॥
तैयारियाँ तो अपनी कुछ नहीं हैं किन्तु हम ,
देने कमर को कसके सख़्त इम्तिहाँ चले ॥
अगुवा बना लिया है अब तो भाग्य को ही सच ,
जाएँगे उसके पीछे लेके वो जहाँ चले ॥
उनके वहाँ तो पत्ता भी हिले नहीं कभी ,
आँधी नहार हो कि शब सदा यहाँ चले ॥
आदत है उसकी वक़्त पे न आए वो कभी ,
तिसपे है शौक़ सर उठा वो नागहाँ चले ॥
( सख़्त इम्तिहाँ = कठिन परीक्षा ,नहार = दिन ,नागहाँ = कुसमय ,अचानक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, May 18, 2016

गीत : 45 - सद्प्रीत

तुझको मैं आजन्म अपना मीत लिक्खूंगा ॥
तुझको मुझमें रुचि नहीं है जानता हूँ मैं ।
योग्य भी तेरे न मैं ये मानता हूँ मैं ।
तू करे दिन रात मुझसे धुर घृणा तो भी ,            
मैं तुझे पल-पल मेरी सद्प्रीत लिक्खूंगा ॥
व्यर्थ दुःख-पीड़ा निरंतर हर तरह केवल ।
तूने यद्यपि मुझको सौंपा है विरह केवल ।
फिर भी तुझको लेके रति-संयोग श्रंगारिक ,
मैं तो हर्ष-उन्माद पूरित गीत लिक्खूंगा ॥
प्रेम-स्वप्निल माल अधटूटी पड़ी मेरी ।
तुझको पाने की शपथ झूठी पड़ी मेरी ।
पाते-पाते तुझको पा पाया न मैं तो क्या ?
होके मेरी हार तुझको जीत लिक्खूंगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, May 17, 2016

मुक्तक : 837 - भूखा भेड़िया




गाय को भूखा भेड़िया या शेर होने पे ॥
आबे ज़मज़म में हलाहिल खुला डुबोने पे ॥
आह को लेके क्या मेरी तबाह होना है ?
रूह आमादा मेरी मत करो या ! रोने पे ॥
( आबे ज़मज़म = अमृत जल , हलाहिल = कालकूट विष , रूह = आत्मा , आमादा = उद्धत , तत्पर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 836 - पानी पर से हाथी



जैसे पानी पर से हाथी चल निकल आया ॥
काले पत्थर में से मीठा जल निकल आया ॥
रात-दिन मैं ढूँढता था जिसको मर-मर कर ,
मेरी मुश्किल का कुछ ऐसे हल निकल आया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 15, 2016

मुक्तक : 835 - जीवन



खट्टे-मीठे के सँग तीखापन-कड़वाहट भी होती ॥
चुप-चुप सन्नाटों के सँग में फुस-फुस आहट भी होती ॥
जीवन में क्या-क्या है शामिल ; गिनवाना बालों जैसा ?
बेफ़िक्री भी इसमें कुछ-कुछ , कुछ घबराहट भी होती ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 44 - जी भर गया है ॥



कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की ।
जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की ।
मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता ,
वही हमसे अक़्सर ही करता दग़ा है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
वो ग़ैरों को क्या अपनों तक को भी खलती ।
मैं करता हूँ जब देखो तब बात जलती ।
उगलती ज़ुबाँ बर्फ़ भी आग जैसा ,
क़सम से मेरा इस क़दर दिल जला है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
हुई साथ में जिसके ख़ालिस बुराई ।
ज़माने ने बस जिसको ठोकर लगाई ।
कई मर्तबा जो गिराया गया हो ,
वही आस्माँ से भी ऊँचा उठा है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
( तज़्रिबा = अनुभव , ज़ाती = निजी , ख़ालिस = विशुद्ध )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, May 13, 2016

मुक्तक : 834 - तुममें स्वर विध्वंस के ॥



कृष्ण के सब मूक हो वाचाल होते कंस के ॥
उठ रहे हैं धीरे-धीरे तुममें स्वर विध्वंस के ॥
हो गया ऐसा तुम्हारे साथ में क्या दुर्घटित ,
रँग रहे हो काग रँग सब छोड़कर ढंग हंस के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, May 12, 2016

मुक्तक : 833 - नर्म बाँहों में.......



हाथ में झट हाथ मेरा धर लिया उसने ॥
नर्म बाँहों में फटाफट भर लिया उसने ॥
इश्क़ के इज़हार का ढंग सोचता ही था ,
आ के इक़रारे मोहब्बत कर लिया उसने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, May 11, 2016

मुक्तक : 832 - जाना है किधर को ?



छूना है शाम को या पकड़ना है सहर को ;
हमको नहीं पता था कि जाना है किधर को ?
जब तक थे पाँँव चलते रहे , चलते रहे हम ,
कटने के बाद भी था रखा जारी सफ़र को ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, May 10, 2016

मुक्तक : 831 - रक्त का चूषक



स्वच्छ-कर्ता को महा दूषक बना देता ॥
दुग्धप्रिय को रक्त का चूषक बना देता ॥
सिर-मुकुट को पाँव की चप्पल बना डाले ,
काल क्षण में हस्ति को मूषक बना देता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, May 9, 2016

गीत : 43 - भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥

सूखे पत्तों में जैसे झट से आग लग जाए ।
पतला कागज़ तनिक सी देख लौ सुलग जाए ।
मेरी जितनी भी कामनाएँ थीं ,
भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥
जैसे पानी में होता हाल कच्ची मिट्टी का ।
अश्रु गिरने से अपने प्राण-प्रिय की चिट्ठी का ।
जो लगाती थीं पार मुझको वो ,
सारी नौकाएँ आज गल बैठीं ॥
जैसे कुछ और वो नहीं हों मेरी छाया हों ।
गिरती दीवार को सम्हालता वो पाया हों ।
साथ में बैठती जो घंटों थीं ,
आज मनुहार पे न पल बैठीं ॥
सच में आजन्म का था , था नहीं क्षणिक मुझको ।
जिनपे विश्वास हाँ स्वयं से भी अधिक मुझको ।
मेरे मित्रों के साथ में मिल वो ,
मेरी सखियाँ भी मुझको छल बैठीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, May 8, 2016

मुक्तक : 830 - नाग की तरह ॥



डसती थी याद दिल को स्याह नाग की तरह ॥
जलता था तन ये जंगलों की आग की तरह ॥
तेरे बिना थी ज़िंदगी बग़ैर आब की ,
इक अंधी बावड़ी , बड़े तड़ाग की तरह ॥
( स्याह=काला ,बग़ैर आब की=जल विहीन ,अंधी बावड़ी=सीढ़ीयुक्त बहुत गहरा कुआँ ,तड़ाग=तालाब ,सरोवर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, May 3, 2016

मुक्तक : 829 - मान जाना रे.....



मान जाना रे किसी दिन न भी मनाने पर ॥
ख़ुद चले आना रे मेरे न भी बुलाने पर ॥
कम से कम तब तो मेरी बात मान जाना रे ,
जब पहुँच जाऊँ रे मैं क़ब्र के मुहाने पर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, May 2, 2016

मुक्तक : 828 - अजगर बड़ा ॥



एक चूहे के लिए छोटा सा भी अजगर बड़ा ॥
ज्यों किसी हाथी को भी हो शेर-ए-बब्बर बड़ा ॥
ख़ूब सुन-पढ़ के भी जो हमने कभी माना नहीं ,
इश्क़ में पड़कर वो जाना , है ये गारतगर बड़ा ॥
( शेर-ए-बब्बर = बब्बर शेर , गारतगर = विनाश करने वाला )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 1, 2016

मुक्तक : 827 - किंचित बड़े न बोल ॥




मुँह से कभी निकालता किंचित बड़े न बोल ॥
करता नहीं हूँ मैं कभी भी बात गोल-मोल ॥
रखता हूँ अपना एक-इक डग भी मैं फूँक-फूँक ,
कहता हूँ वाक्य-वाक्य में मैं शब्द तोल-तोल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...