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Showing posts from May, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 843 - यूँ ही गुलशन में.....

मेरे खिलते ही पूरा मुझको भी तोड़ा जाता ॥ यूँ ही गुलशन में मुझ कली को न छोड़ा जाता ॥ खूबसूरत भी नहीं और न खुशबूदार हूँ मैं , वरना मुझको भी इत्र को न निचोड़ा जाता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 842 - लेना सबक ज़रूर.....

भूले न फटकता था कभी पास जो मेरे , क्यों वक़्त वो निकाल के अब रोज़ ही आता ? ऐसा नहीं कि उसको मैं अच्छा लगा करूँ , ये भी नहीं कि उसको मेरा हुस्न लुभाता !! हैरत न खाना आप सबब इसका जानकर , लेना सबक ज़रूर इसको सच ही मानकर , जाना है जबसे उसने ये कि मैं तो मोम हूँ – कुछ धूप , थोड़ी आँच रखके साथ में लाता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 188 : अल्लाह है ना राम

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मीर है ना मिर्ज़ा ग़ालिब नाम मेरा है ॥ हाँ ग़ज़ल हर रोज़ कहना काम मेरा है ॥ मैंने कब सीता चुराई फिर भी रावण सा , किसलिए होता बुरा अंजाम मेरा है ? उनके लब पे प्यास का यों ज़िक्र आया था , दे दिया मैंने उठाकर जाम मेरा है ॥ झूठ के दम पर तो मैं आज़ाद फिरता था , क़ैद तो सच कहने का इन्आम मेरा है ॥ मैं तो बस इंसानियत को मानता हूँ रब , ना मेरा अल्लाह है ना राम मेरा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 841 - तलाशना हमें बहारों में ॥

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मत खुले में तलाशना हमें बहारों में ॥ ढूँढना पत्थरों के ऊँचे कारागारों में ॥ सिर्फ़ इक भूल का अंजाम भोगने को खड़े , हम ख़तरनाक गुनहगारों की कतारों में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 840 - वो सीधा-सादा सा

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वो सीधा-सादा सा टेढ़ी निगाह कर बैठा ॥ शरीफ़ हो के भी जुर्म-ओ-गुनाह कर बैठा ॥ बनाते ही बनाते अधबने को जाने क्यों न करके पूरा वो पूरा तबाह कर बैठा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 839 - पाँव की जूती

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कल की चीज़ों की अभी की आज की रक्खी ॥ पाँव की जूती की सिर के ताज की रक्खी ॥ कौन सा बाज़ार है ये जिसमे तितली की , बेचने वालों ने क़ीमत बाज की रक्खी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 838 - कबरी बिल्ली हो गए ॥

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हम जबलपुर से यकायक सीधे दिल्ली हो गए ॥ एक चूहे से बिफरती कबरी बिल्ली हो गए ॥ मुल्ला नसरुद्दीन थे लेकिन हुआ फुर्सत में यों , मन के लड्डू खाते-खाते शेख़चिल्ली हो गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-ग़ज़ल : 189 - उन्ही का ख़्वाब रहे ॥

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हम पे प्यासों में भी न क़तरा भर भी आब रहे ॥ उन पे नश्शे में भी सुराही भर शराब रहे ॥ रोशनी को चिराग़ भी नहीं रहे हम पे , उनकी मुट्ठी में क़ैद सुर्ख़ आफ़्ताब रहे ॥ जबकि मालूम है कि शर्हा- शर्हा होना है , फिर भी आँखों में मेरी बस उन्ही का ख़्वाब रहे ॥ कैसे आए यक़ीं जो आज अपनी हालत है , हम कभी इस जहाँ सबसे कामयाब रहे ? आज सरताज हैं अपने हुनर से हम जिनके , पाँव की जूती कभी और कभी जुराब रहे ॥ उनकी ताउम्र नज़र में हम इक ख़ता की वजह , अच्छे होकर भी बस ख़राब बस ख़राब रहे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 188 - कामयाबी

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हमने देखा फ़ायदा कुछ भी नहीं तदबीर का ॥ कामयाबी में हमेशा हाथ हो तक़दीर का ॥ बेर जब हमको ज़रूरी हमको मत अंगूर दो , जिस जगह अमरूद लाज़िम काम क्या अंजीर का ? बाँधने उसको चले तुम रेशमी धागा लिए , जिसके आगे टूटता दम रस्से का , ज़ंजीर का ॥ नौजवाँ इक रोज़ बूढ़ा तू भी होगा शर्तिया , मत मज़ा ले राह चलते कँपकँपाते पीर का ॥ जंगजू की नौकरी करता है वो सरकार की , और लगता है उसे डर तीर का , शमशीर का ॥ सब ग़ज़ल कहते रहें ताउम्र लेकिन सच है ये , पा न पाएंगे कभी रुतबा वो ग़ालिब - मीर का ॥ ( तदबीर = प्रयास , लाज़िम = आवश्यक , पीर = वृद्ध , जंगजू = सैनिक , शमशीर = तलवार ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 187 - इम्तिहाँ

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जीवन बिताने पूछ मत कि हम कहाँ चले ? हर ओर मृत्यु नृत्यरत है हम वहाँ चले ॥ तैयारियाँ तो अपनी कुछ नहीं हैं किन्तु हम , देने कमर को कसके सख़्त इम्तिहाँ चले ॥ अगुवा बना लिया है अब तो भाग्य को ही सच , जाएँगे उसके पीछे लेके वो जहाँ चले ॥ उनके वहाँ तो पत्ता भी हिले नहीं कभी , जब देखो तब ही पाओगे आँधी यहाँ चले ॥ आदत है उसकी वक़्त पे न आए वो कभी , तिसपे है शौक सर उठा वो नागहाँ चले ॥ ( सख़्त इम्तिहाँ = कठिन परीक्षा , नागहाँ = कुसमय , अचानक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

गीत : 45 - सद्प्रीत

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तुझको मैं आजन्म अपना मीत लिक्खूंगा ॥ तुझको मुझमें रुचि नहीं है जानता हूँ मैं । योग्य भी तेरे न मैं ये मानता हूँ मैं । तू करे दिन रात मुझसे धुर घृणा तो भी , मैं तुझे पल-पल मेरी सद्प्रीत लिक्खूंगा ॥ व्यर्थ दुःख-पीड़ा निरंतर हर तरह केवल । तूने यद्यपि मुझको सौंपा है विरह केवल । फिर भी तुझको लेके रति-संयोग श्रंगारिक , मैं तो हर्ष-उन्माद पूरित गीत लिक्खूंगा ॥ प्रेम-स्वप्निल माल अधटूटी पड़ी मेरी । तुझको पाने की शपथ झूठी पड़ी मेरी । पाते-पाते तुझको पा पाया न मैं तो क्या ? होके मेरी हार तुझको जीत लिक्खूंगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 837 - भूखा भेड़िया

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गाय को भूखा भेड़िया या शेर होने पे ॥ आबे ज़मज़म में हलाहिल खुला डुबोने पे ॥ क्या मेरी आह को लेकर तबाह होना है ? मत मेरी रूह को आमादा करो रोने पे ॥ ( आबे ज़मज़म = अमृत जल , हलाहिल = कालकूट विष , रूह = आत्मा ,  आमादा = उद्धत , तत्पर ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 836 - पानी पर से हाथी

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जैसे पानी पर से हाथी चल निकल आया ॥ काले पत्थर में से मीठा जल निकल आया ॥ रात-दिन मैं ढूँढता था जिसको मर-मर कर , मेरी कठिनाई का ऐसे हल निकल आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 835

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खट्टे - मीठे के सँग तीखापन - कड़वाहट भी होती ॥ चुप-चुप सन्नाटों के सँग में फुस-फुस आहट भी होती ॥ जीवन में क्या-क्या है शामिल _गिनवाना बालों जैसा ? बेफ़िक्री भी इसमें कुछ-कुछ , कुछ घबराहट भी होती ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 44 - जी भर गया है ॥

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कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ? मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥ न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की । जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की । मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता , वही हमसे अक्सर ही करता दग़ा है ॥ वो ग़ैरों को क्या अपनों तक को भी खलती । मैं करता हूँ जब देखो तब बात जलती । उगलती ज़ुबाँ बर्फ़ भी आग जैसा , क़सम से मेरा इस क़दर दिल जला है ॥ हुई साथ में जिसके ख़ालिस बुराई । ज़माने ने बस जिसको ठोकर लगाई । कई मर्तबा जो गिराया गया हो , वही आस्माँ से भी ऊँचा उठा है ॥ ( तज़्रिबा = अनुभव , ज़ाती = निजी , ख़ालिस = विशुद्ध )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 834 - तुममें स्वर विध्वंस के ॥

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कृष्ण के सब मूक हो वाचाल होते कंस के ॥ उठ रहे हैं धीरे-धीरे तुममें स्वर विध्वंस के ॥ हो गया ऐसा तुम्हारे साथ में क्या दुर्घटित , रँग रहे हो काग रँग सब छोड़कर ढंग हंस के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 833 - नर्म बाँहों में.......

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हाथ में झट हाथ मेरा धर लिया उसने ॥ नर्म बाँहों में फटाफट भर लिया उसने ॥ इश्क़ के इज़हार का ढंग सोचता ही था , आ के इक़रारे मोहब्बत कर लिया उसने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 832 - जाना है किधर को ?

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छूना है शाम को या पकड़ना है सहर को ॥ हमको नहीं पता था कि जाना है किधर को ? जब तक थे पाँव तब तलक तो चलते ही रहे , कटने के बाद भी रखा था जारी सफ़र को ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 831 - रक्त का चूषक

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स्वच्छ-कर्ता को महा दूषक बना देता ॥ दुग्धप्रिय को रक्त का चूषक बना देता ॥ सिर-मुकुट को पाँव की चप्पल बना डाले , काल क्षण में हस्ति को मूषक बना देता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 43 - भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥

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सूखे पत्तों में जैसे झट से आग लग जाए । पतला कागज़ तनिक सी देख लौ सुलग जाए । मेरी जितनी भी कामनाएँ थीं , भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥ जैसे पानी में होता हाल कच्ची मिट्टी का । अश्रु गिरने से अपने प्राण-प्रिय की चिट्ठी का । जो लगाती थीं पार मुझको वो , सारी नौकाएँ आज गल बैठीं ॥ जैसे कुछ और वो नहीं हों मेरी छाया हों । गिरती दीवार को सम्हालता वो पाया हों । साथ में बैठती जो घंटों थीं , आज मनुहार पे न पल बैठीं ॥ सच में आजन्म का था , था नहीं क्षणिक मुझको । जिनपे विश्वास हाँ स्वयं से भी अधिक मुझको । मेरे मित्रों के साथ में मिल वो , मेरी सखियाँ भी मुझको छल बैठीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 830 - नाग की तरह ॥

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डसती थी याद दिल को स्याह नाग की तरह ॥ जलता था तन ये जंगलों की आग की तरह ॥ तेरे बिना थी ज़िंदगी बग़ैर आब की , इक अंधी बावड़ी , बड़े तड़ाग की तरह ॥ ( स्याह=काला ,बग़ैर आब की=जल विहीन ,अंधी बावड़ी=सीढ़ीयुक्त बहुत गहरा कुआँ ,तड़ाग=तालाब ,सरोवर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 829 - मान जाना रे.....

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मान जाना रे किसी दिन न भी मनाने पर ॥ ख़ुद चले आना रे मेरे न भी बुलाने पर ॥ कम से कम तब तो मेरी बात मान जाना रे , जब पहुँच जाऊँ रे मैं क़ब्र के मुहाने पर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 828 - अजगर बड़ा ॥

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एक चूहे के लिए छोटा सा भी अजगर बड़ा ॥ ज्यों किसी हाथी को भी हो शेर-ए-बब्बर बड़ा ॥ ख़ूब सुन-पढ़ के भी जो हमने कभी माना नहीं , इश्क़ में पड़कर वो जाना , है ये गारतगर बड़ा ॥ ( शेर-ए-बब्बर = बब्बर शेर , गारतगर = विनाश करने वाला )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति