*मुक्त-मुक्तक : 822 - कागज से भी पतली


कागज से भी पतली या फिर किसी ग्रंथ से मोटी से ॥
सागर से भी अधिक बड़ी या बूँद मात्र से छोटी से ॥
ताजी - ताजी अंगारे सी या हिम सी बासी - बासी ,
मिलवा दो प्राचीन भूख को सद्य वांछित रोटी से ॥
( सद्य = इसी समय , वांछित = आवश्यक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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