*मुक्त-मुक्तक : 820 - गुलों की शक्ल


गुलों की शक्ल में दरअस्ल यह बस ख़ार होती है ॥
लगा करती है दरवाज़ा मगर दीवार होती है ॥
हक़ीक़त में ही हम यारों न पैदा ही हुए होते ,
अगर यह जान जाते ज़िंदगी दुश्वार होती है ॥
 ( गुल = पुष्प , ख़ार = काँटा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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