ग़ज़ल : 186 - कच्ची-पक्की शराब की बातें ॥


पैर लटके हैं क़ब्र में फिर भी , 
बस ज़ुबाँ पे शबाब की बातें ॥
लोग हँसते हैं सुनके सब ही तो , 
शेख़चिल्ली-जनाब की बातें ॥
दाँत मुँह में नहीं रहे उनके , 
न आँतें हैं पेट में बाक़ी ,
करते रहते हैं फिर भी जब देखो , 
तब ही मुर्ग़-ओ-क़बाब की बातें ॥
भैंस के ही समान लगते हैं
उनको घनघोर काले अक्षर भी ,
मुँह से उनके मगर हमेशा ही , 
आप सुनना किताब की बातें ॥
आप मानेंगे कब मेरी लेकिन , 
मैंने नासेह के सुनी मुँह से ,
अपने कानों से ख़ुद के कल सचमुच , 
कच्ची-पक्की शराब की बातें ॥
साँस लेने में भी है उनको सच , 
हाय तक्लीफ़ दाढ़ दुखने सी ,
और करते हैं सूँघने की वो , 
सिर्फ इत्रे-गुलाब की बातें ॥
उनके सर के न टोप की बातें , 
ना गले के हसीं दुपट्टे की ,
जब भी करते हैं वो तो पाँवों के , 
उनके जूते-जुराब की बातें ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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