185 : ग़ज़ल - खलबली



बात अच्छी भी आज उसकी क्यों खली हमको ?
जिसकी बकबक भी कल तलक लगी भली हमको ॥
 क्या हुआ आज कह रहा हमें वही काँटा ,
जो चुभन में भी बोलता था गुल-कली हमको ?
आज कहता है क्यों हमें वो अद्ना , मामूली ,
कल जो कहता फिरे था रात-दिन वली हमको ?
अपनी आमद से तो रुकें बड़े-बड़े तूफ़ाँ ,
उसने फिर किस बिना पे बोला खलबली हमको ?
भूल बैठा है वो जो वाँ हमारी सूरत भी ,
याद रहती है उसके घर की हर गली हमको ॥
उनका दम घुट गया ग़ुबार देखते ही वाँ ,
गर्द में जी यहाँ न कास तक चली हमको ॥
सबको तलकर खिलाईं उसने पूरियाँ मीठी ,
सख़्त मोटी औ' कच्ची रोट अधजली हमको ॥
यों तो पहले भी कहते थे भला-बुरा लेकिन ,
आज गाली ही बक दी वो बहुत खली हमको ॥
( वली = महात्मा , कास = खाँसी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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