184 : मुक्त-ग़ज़ल - मैं फ़िदा था

कैसी भी हो ताती-बासी-पतली-मोटी ॥
भूख में आँखों में नचती सिर्फ़ रोटी ॥
काटती कान है बड़े से भी बड़ों के ,
उम्रो क़द में छोटे छोटों से वो छोटी ॥
मैं फ़िदा था जिसपे वो जाने क्यों उसने ,
जड़ से ही कटवा दी घुटनों तक की चोटी ॥
लोटता है ज्यों गधा धरती पे मेरी ,
नर्म बिस्तर पर न कबसे नींद लोटी ?
वो मुझे इतना ज़रूरी है क़सम से ,
भूख में कुत्ते को ज्यों होती है बोटी ॥
आजकल साहिल पे भी हम डूबते हैं ,
पहले तो इतनी न थी तक़्दीर खोटी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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