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Showing posts from April, 2016

ग़ज़ल : 186 - कच्ची-पक्की शराब की बातें ॥

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पैर लटके हैं क़ब्र में फिर भी ,बस ज़ुबाँ पे शबाब की बातें ।। लोग हँसते हैं सुनके सब ही तो ,शेख़चिल्ली-जनाब की बातें ।। दाँत मुँह में नहीं रहे उनके ,औ’ न आँतें हैं पेट में बाक़ी , करते रहते हैं फिर भी जब देखो ,तब ही मुर्ग़-ओ-क़बाब की बातें  भैंस के ही समान लगते हैं , उनको घनघोर काले अक्षर भी , मुँह से उनके मगर हमेशा ही ,आप सुनना किताब की बातें ।। आप मानेंगे कब मेरी लेकिन ,मैंने नासेह के सुनी मुँह से , अपने कानों से ख़ुद के कल सचमुच ,कच्ची-पक्की शराब की बातें ।। साँस लेने में भी है उनको सच ,हाय तक्लीफ़ दाढ़ दुखने सी , और करते हैं सूँघने की वो ,सिर्फ इत्रे-गुलाब की बातें ।। उनके सर के न टोप की बातें ,ना गले के हसीं दुपट्टे की , जब भी करते हैं वो तो पाँवों के ,

मुक्तक : 826 - जोड़-तोड़ कर

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जोड़-घटाकर जैसे-तैसे इक घर बनवाया ॥ पर कुदरत को मेरा यह निर्माण नहीं भाया ॥ रात अचानक जब इसमें सब सोए थे सुख से , छोड़ मुझे कुछ भी न बचा ऐसा भूकंप आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 825 - जब चाहे तू छुड़ाले ॥

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भूखा है तो चबाकर  जी भर के मुझको खाले ॥ प्यास अपनी क़तरा-क़तरा  खूँ चूसकर बुझाले ॥ मालिक है तू मेरा , हर इक हक़ है मुझपे तेरा , जो चाहिए मेरा सब  जब चाहे तू छुड़ाले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 824 - चूमेगी कह-कह बालम ॥

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हँसके जीने भी नहीं देते जो लोग आज मुझे , मेरे मरने पे मनाएँगे ग़ज़ब का मातम ।। आज लगती है मेरी चाल उन्हें बेढब सी , कल मेरे तौर-तरीक़ों पे चलेगा आलम ।। वक़्त बेशक़ जो मुझे आज दुलत्ती मारे , बात तक़्दीर मेरी कोई भी सुनती न अभी ; लेकिन इक रोज़ दुलारेगा यही वक़्त मुझे , ये ही तक़्दीर मुझे चूम कहेगी बालम ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 823 - सौभाग्य–लेखन

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चाहता था मेरे हाथों में तेरा मन-हाथ होता ॥ स्वर्ग से ले नर्क तक तू मेरे हर छन साथ होता ॥ मिल के सारे काट लेते रास्ते काँटों भरे हम , किन्तु कब सबके लिए सौभाग्य-लेखन माथ होता ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 822 - कागज से भी पतली

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कागज से भी पतली या फिर ग्रंथों से भी मोटी से ॥ सागर से भी ज्यादा विस्तृत या बूँदोंं से छोटी से ॥ ताजा-ताजा अंगारे सी या हिम सी ठण्डी बासी , मिलवा दो प्राचीन क्षुधा को सद्यावश्यक रोटी से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

185 : ग़ज़ल - खलबली

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बात अच्छी भी आज उसकी क्यों खली हमको ? जिसकी बकबक भी कल तलक लगी भली हमको ॥  क्या हुआ आज कह रहा हमें वही काँटा , जो चुभन में भी बोलता था गुल-कली हमको ? आज कहता है क्यों हमें वो अद्ना , मामूली , कल जो कहता फिरे था रात-दिन वली हमको ? अपनी आमद से तो रुकें बड़े-बड़े तूफ़ाँ , उसने फिर किस बिना पे बोला खलबली हमको ? भूल बैठा है वो जो वाँ हमारी सूरत भी , याद रहती है उसके घर की हर गली हमको ॥ उनका दम घुट गया ग़ुबार देखते ही वाँ , गर्द में जी यहाँ न कास तक चली हमको ॥ सबको तलकर खिलाईं उसने पूरियाँ मीठी , सख़्त मोटी औ' कच्ची रोट अधजली हमको ॥ यों तो पहले भी कहते थे भला-बुरा लेकिन , आज गाली ही बक दी वो बहुत खली हमको ॥
( वली = महात्मा , कास = खाँसी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 821 - अर्क-ए-गुलाब

पानी तलब करो मैं ला दूँ अर्क-ए-गुलाब ॥
गर तुम कहो तो इक सफ़्हा क्या लिख दूँ मैं किताब ॥
हसरत है तुम जो माँँगो दूँ वो उससे बढ़के तुमको ,
बदले में दो जो अपना सच्चा प्यार बेहिसाब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


गीत : 42 - क्या किसी भूले हुए.....

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क्या किसी भूले हुए ग़म की याद आने लगी ? हँसते - हँसते हुए क्यूँ आँख छलछलाने लगी ? क्या किसी भूले हुए.......................... आँख कस - कस के भी लगाए लग न पाती है । रात करवट बदल - बदल के बीत जाती है । लोग खो जाते हैं सपनों में झपकते ही पलक । हमको क्यूँ नींद भी इक ख़्वाब नज़र आती है ? मुश्किलों से ही हुआ था अभी आराम नसीब , कोई तक्लीफ़ तभी फ़िर से सिर उठाने लगी ॥ क्या किसी भूले हुए.......................... हमको तपने का नहीं शौक़ फ़िर भी तपते हैं । धूप अप्रेल - मई दोपहर की सहते हैं । हमको शोलों से मुलाक़ात की कब चाह रहे ? होके मज़्बूर ही सूरज से हम लिपटते हैं । आज मौक़ा जो मिला चाँद को छूने का हमें , चाँदनी उसकी मैं हैराँ हूँ क्यूँ जलाने लगी ? क्या किसी भूले हुए.......................... हँसते - हँसते हुए..............................
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

184 : ग़ज़ल - मैं फ़िदा था

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कैसी भी हो ताती-बासी-पतली-मोटी ॥ भूख में आँखों में नचती सिर्फ़ रोटी ॥
कान काटे है बड़े से भी बड़ों के , उम्रो क़द में छोटे छोटों से वो छोटी ॥ मैं फ़िदा था जिसपे वो जाने क्यों उसने , जड़ से ही कटवा दी घुटनों तक की चोटी ॥ लोटता है ज्यों गधा धरती पे मेरी , नर्म बिस्तर पर न कबसे नींद लोटी ? वो मुझे इतना ज़रूरी है क़सम से , भूख में कुत्ते को ज्यों होती है बोटी ॥ आजकल साहिल पे भी हम डूबते हैं , पहले तो इतनी न थी तक़्दीर खोटी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 820 - गुलों की शक्ल

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गुलों की शक्ल में दरअस्ल यह बस ख़ार होती है ॥ लगा करती है दरवाज़ा मगर दीवार होती है ॥ हक़ीक़त में ही हम यारों न पैदा ही हुए होते , अगर यह जान जाते ज़िंदगी दुश्वार होती है ॥ ( गुल = पुष्प , ख़ार = काँटा ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति