विश्वासघात

                 
विश्वासघात को लेकर सबके अपने-अपने व्यक्तिगत अनुभव हैं किन्तु एक बात सर्वव्यापी है  कि इसका आघात सबके लिए अकस्मात , अनपेक्षित और असहनीय होता है , फिर चाहे वह बड़ा हो या छोटा धोखा । और तब तो यह और भी पीड़ादायी हो जाता है जबकि यह अपनों अर्थात दोस्तों या सगे संबंधियों द्वारा किया गया हो । प्रश्न यह है कि क्या विश्वासघात एक अवश्यंभावी अनुभव है ? और यदि है तो क्या किया जाए ? जो यह कहते है कि किसी पर विश्वास किया ही न जाए तो मुझे यह बात इसलिए नहीं जँचती क्योंकि फिर जीवन नीरस हो जाएगा । अतः विश्वास तो रखना ही पड़ता है और जब अपनों पर भी विश्वास न रखा जाएगा तो फिर सामाजिक सम्बन्धों का क्या अर्थ रह जाएगा ? विश्वास जीवन की अनिवार्य शर्त है । आए दिन बैलगाड़ी से लेकर हवाईजहाज तक की भीषण दुर्घटनाएँ होती रहती हैं तो क्या हम सफर करना छोड़ दें ? सतर्कता अवश्यमेव वांछित है । धोखा देना और धोखा खाना आजन्म चलता रहेगा और यह मानकर ही हम  विश्वासघात की पीड़ा से उबर सकते हैं । क्योंकि मानव स्वभाव को देखते हुए यह एक आश्चर्यविहीन और सामान्य बात लगती है । सदियों से इश्क़ में नाकाम रहने वालों और धोखा खाने वालों के किस्से सुन सुन कर भी लोग मोहब्बत करना नहीं छोडते क्यों / मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमें इस धोखाधड़ी , बेवफ़ाई को स्वीकारना होगा क्योंकि धोखे के भावी डर से आप संभाव्य मनचाहे इश्क़ का परित्याग नहीं कर सकते और जब ओखली में सिर दे ही दिया जाता है तो मूसलों की मार भी सहन कर ही ली जाती है । धोखा यदि अपेक्षित मान लिया जाए तो सहना आसान हो जाता है जैसे कि किसी अत्यंत प्रिय किन्तु दीर्घकाल से असाध्य रोग से पीड़ित बिस्तर पर पड़े व्यक्ति की मृत्यु का आघात । अकस्मात और अनपेक्षित घटना हमें आश्चर्यचकित अथवा शोकविह्वल करती है किन्तु अपेक्षित अथवा सुनिश्चित घटनाओं से हम अधिक प्रभावित नहीं होते । एक बात और स्पष्ट करना चाहूँगा कि अविश्वास रखना और धोखे की संभावना की स्वीकृति का अर्थ यह हरगिज़ नहीं है कि धोखा होकर ही रहेगा अपितु केवल यही है कि तब यह सहज सह्य हो जाएगा । फिर भी मैं बार बार यही चाहूँगा कि विश्वास करना पड़ता है , करना चाहिए अन्यथा जीवन शुष्क बन जाएगा ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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