*मुक्त-मुक्तक : 817 - अबके अवसर



अबके अवसर ना छोडूँगा यार लगाऊँगा ॥
गिन-गिन कर इक बार नहीं सौ बार लगाऊँगा ॥
कबसे मंशा है तुझको अपने रँग रँगने की ,
इस होली में तुझ पर रँग-भंडार लगाऊँगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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