*मुक्त-मुक्तक : 816 - जीर्ण - शीर्ण है



भग्न है जीर्ण - शीर्ण है निपट निरालय है ॥
मन मेरा क्या है एक दुःख का संग्रहालय है ॥
कष्ट की खाई का इसमें है कहीं पर डेरा ,
इसमें पीड़ा का कहीं  बस रहा हिमालय है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे