*मुक्त-मुक्तक : 814 - नर्म बिस्तर पर


नर्म बिस्तर पर बदलते करवटें रातें हुईं ॥
कहने को उनसे कई लंबी मुलाकातें हुईं ॥
कब बुझाने प्यास को या सींचने के वास्ते ?
सिर्फ़ सैलाबों के मक़सद से ही बरसातें हुईं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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