*मुक्त-मुक्तक : 813 - गुसल करते हैं ॥




ख़ूब आहिस्ता चुपके-चुपके सम्हल करते हैं ॥
अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़ीस्त अजल करते हैं ॥
एक बोतल शराब हम कभी कभी पीकर ,
वो तो इंसाँ के खूँ से रोज़ गुसल करते हैं ॥
( आहिस्ता=धीरे , ज़ीस्त=जीवन ,अजल=मृत्यु ,गुसल=स्नान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (07-03-2016) को "शिव का ध्यान लगाओ" (चर्चा अंक-2274) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक