*मुक्त-मुक्तक : 812 - कब मिटाती हैं मुझे ?



ग़मज़दा हरगिज़ नहीं ये मुझको करतीं शाद हैं ॥
कब मिटाती हैं मुझे ? करतीं ये बस आबाद हैं ॥
कौन कहता है कि मेरा रहनुमा कोई नहीं ?
मुझको मेरी ठोकरें सबसे बड़ी उस्ताद हैं ॥
( शाद=प्रसन्न ,रहनुमा=पथप्रदर्शक ,उस्ताद=गुरु )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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