183 : *मुक्त-ग़ज़ल - इश्क़ में सच हो फ़ना

इश्क़ में सच हो फ़ना हम शाद रहते हैं ॥
लोग तो यों ही हमें बरबाद कहते हैं ॥
आँसुओं का क्या है जब मर्ज़ी हो आँखों से ,
हो खुशी तो भी लुढ़क गालों पे बहते हैं ॥
मार से कब टूटते इंसाँ हथौड़ों की ,
वो तो अपने प्यार की ठोकर से ढहते हैं ॥
जो हों ज़ख़्मी फूल से भी वो भी पत्थर की ,
सख़्त मज्बूरी में हँस – हँस चोट सहते हैं ॥
सूर्य से भी हम कभी पाते थे ठंडक आज ,
हिज़्र में तेरे सनम चंदा से दहते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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