182 : *मुक्त-ग़ज़ल - चोली - घाघरा

आज खालीपन मेरा पूरा भरा है ॥
अब कहीं पीला नहीं है बस हरा है ॥
जिसपे मैं क़ुर्बान था आग़ाज़ से ही ,
वह भी आखिरकार मुझ पर आ मरा है ॥
उसने मुझको तज के ग़ैर अपना लिया जब ,
मैंने भी अपना लिया तब दूसरा है ॥
कुछ न पाया मैंने की हासिल मोहब्बत ,
ज़िंदगी में इससे बढ़कर क्या धरा है ?
बन न पाया मैं सहारा उसका लेकिन ,
अब भी वो संबल है मेरा आसरा है ॥
आदमी जाँ को बचाने कुछ भी खा ले ,
शेर ने कब भूख में तृण को चरा है ?
भूल है मर्दों से कम उसको समझना ,
उसने बेशक़ पहना चोली - घाघरा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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