181 : *मुक्त-ग़ज़ल - जहर ला पिलवा

एक तूने क्या दिया धोखा मुझे ?
दोस्त सब लगने लगे खतरा मुझे ॥
मैंने तोहफे में तुझे बंदूक दी ,
तूने गोली से दिया उड़वा मुझे ॥
मैं बढ़ाता ही रहा शुहरत तेरी ,
और तू करता रहा रुसवा मुझे ॥
तुझ तलक आने को मैं मरता रहा ,
और तू करता रहा चलता मुझे ॥
सब दिया पर क्या दिया कुछ ना दिया ,
कुछ न देता सिर्फ दिल देता मुझे ॥
कर्ज़ जो तुझको दिये ले कर्ज़ ख़ुद ,
माँगता हूँ खा तरस लौटा मुझे ॥
हो चुकी ज़ुल्मो सितम की इंतेहा ,
इक करम कर जहर ला पिलवा मुझे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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