*मुक्त-ग़ज़ल : 180 - क्यों मैं सोचूँ ?

क्यों मैं सोचूँ दौर मेरा थम गया है ?
खौलता लोहू रगों में जम गया है ॥
खिलखिलाते उठ रहे हैं सब वहाँ से ,
जो भी आया वो यहाँ से नम गया है ॥
इक शराबी से ही जाना राज़ ये ,
मैक़शी से कब किसी का ग़म गया है ?
चोरियाँ चुपचाप करते हैं सभी ,
दिल चुराकर वो मेरा छम-छम गया है ॥
इसमें क्या हैरानगी की बात जो ,
शह्र में जाकर गँवार इक रम गया है ?
उसका जीने की तमन्ना में ही सच ,
जितना भी बाक़ी बचा था दम गया है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-03-2016) को "दूर से निशाना" (चर्चा अंक-2272) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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