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Showing posts from March, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 819 - कोयल की कूक

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कोयल की कूक वानरी किट-किट भी मुझमें है ॥ मुझमें कहीं धड़ाम भी चिट-चिट भी मुझमें है ॥ किरदार से शफ़्फाक हंस हूँ मगर सुनो , हालात के मुताबिक़ गिरगिट भी मुझमें है ॥ ( किरदार = चरित्र , शफ़्फाक = उजला , हालात= परिस्थिति  ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

183 : *मुक्त-ग़ज़ल - इश्क़ में सच हो फ़ना

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इश्क़ में सच हो फ़ना हम शाद रहते हैं ॥ लोग तो यों ही हमें बरबाद कहते हैं ॥ आँसुओं का क्या है जब मर्ज़ी हो आँखों से , हो खुशी तो भी लुढ़क गालों पे बहते हैं ॥ मार से कब टूटते इंसाँ हथौड़ों की , वो तो अपने प्यार की ठोकर से ढहते हैं ॥ जो हों ज़ख़्मी फूल से भी वो भी पत्थर की , सख़्त मज्बूरी में हँस – हँस चोट सहते हैं ॥ सूर्य से भी हम कभी पाते थे ठंडक आज , हिज़्र में तेरे सनम चंदा से दहते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

182 : *मुक्त-ग़ज़ल - चोली - घाघरा

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आज खालीपन मेरा पूरा भरा है ॥ अब कहीं पीला नहीं है बस हरा है ॥ जिसपे मैं क़ुर्बान था आग़ाज़ से ही , वह भी आखिरकार मुझ पर आ मरा है ॥ उसने मुझको तज के ग़ैर अपना लिया जब , मैंने भी अपना लिया तब दूसरा है ॥ कुछ न पाया मैंने की हासिल मोहब्बत , ज़िंदगी में इससे बढ़कर क्या धरा है ? बन न पाया मैं सहारा उसका लेकिन , अब भी वो संबल है मेरा आसरा है ॥ आदमी जाँ को बचाने कुछ भी खा ले , शेर ने कब भूख में तृण को चरा है ? भूल है मर्दों से कम उसको समझना , उसने बेशक़ पहना चोली - घाघरा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मैं हूँ विरह

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मैं हूँ विरह मधुमास नहीं ॥ तड़पन हूँ नट , रास नहीं ॥ मुझको दुःख में पीर उठे , हँसने का अभ्यास नहीं ॥ उनके बिन जीना _मरना , क्यों उनको आभास नहीं ? उनका हर आदेश सुनूँ , पर मैं उनका दास नहीं ॥ दिखने में तो हैं निकट -निकट , दूर - दूर तक पास नहीं ॥ भव्य हवेली तो हैं वो , गेह नहीं आवास नहीं ॥ इष्ट हैं वो मेरे विशिष्ट , मैं उनका कुछ ख़ास नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

181 : *मुक्त-ग़ज़ल - जहर ला पिलवा

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एक तूने क्या दिया धोखा मुझे ? दोस्त सब लगने लगे खतरा मुझे ॥ मैंने तोहफे में तुझे बंदूक दी , तूने गोली से दिया उड़वा मुझे ॥ मैं बढ़ाता ही रहा शुहरत तेरी , और तू करता रहा रुसवा मुझे ॥ तुझ तलक आने को मैं मरता रहा , और तू करता रहा चलता मुझे ॥ सब दिया पर क्या दिया कुछ ना दिया , कुछ न देता सिर्फ दिल देता मुझे ॥ कर्ज़ जो तुझको दिये ले कर्ज़ ख़ुद , माँगता हूँ खा तरस लौटा मुझे ॥ हो चुकी ज़ुल्मो सितम की इंतेहा , इक करम कर जहर ला पिलवा मुझे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 818 - मुझपे करना ज़ुल्म

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मुझपे करना ज़ुल्म सारे , रात – दिन करना जफ़ा ॥ खुश न रहना मुझसे चाहे रहना तुम हरदम ख़फ़ा ॥ गालियाँ भी जितना जी चाहे मुझे बकना मगर , इक गुज़ारिश है कभी कहना मुझे मत बेवफ़ा ॥
डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 817 - अबके अवसर

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अबके अवसर ना छोडूँगा यार लगाऊँगा ॥ गिन-गिन कर इक बार नहीं सौ बार लगाऊँगा ॥ कबसे मंशा है तुझको अपने रँग रँगने की , इस होली में तुझ पर रँग-भंडार लगाऊँगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 816 - जीर्ण - शीर्ण है

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भग्न है जीर्ण - शीर्ण है निपट निरालय है ॥ मन मेरा क्या है एक दुःख का संग्रहालय है ॥ कष्ट की खाई का इसमें है कहीं पर डेरा , इसमें पीड़ा का कहीं  बस रहा हिमालय है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

विश्वासघात

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विश्वासघातको लेकर सबके अपने-अपने व्यक्तिगत अनुभव हैं किन्तु एक बात सर्वव्यापी है  कि इसका आघात सबके लिए अकस्मात , अनपेक्षित और असहनीय होता है , फिर चाहे वह बड़ा हो या छोटा धोखा । और तब तो यह और भी पीड़ादायी हो जाता है जबकि यह अपनों अर्थात दोस्तों या सगे संबंधियों द्वारा किया गया हो । प्रश्न यह है कि क्या विश्वासघात एक अवश्यंभावी अनुभव है ? और यदि है तो क्या किया जाए ? जो यह कहते है कि किसी पर विश्वास किया ही न जाए तो मुझे यह बात इसलिए नहीं जँचती क्योंकि फिर जीवन नीरस हो जाएगा । अतः विश्वास तो रखना ही पड़ता है और जब अपनों पर भी विश्वास न रखा जाएगा तो फिर सामाजिक सम्बन्धों का क्या अर्थ रह जाएगा ? विश्वास जीवन की अनिवार्य शर्त है । आए दिन बैलगाड़ी से लेकर हवाईजहाज तक की भीषण दुर्घटनाएँ होती रहती हैं तो क्या हम सफर करना छोड़ दें ? सतर्कता अवश्यमेव वांछित है । धोखा देना और धोखा खाना आजन्म चलता रहेगा और यह मानकर ही हम  विश्वासघात की पीड़ा से उबर सकते हैं । क्योंकि मानव स्वभाव को देखते हुए यह एक आश्चर्यविहीन और सामान्य बात लगती है । सदियों से इश्क़ में नाकाम रहने वालों और धोखा खाने वालों के किस्से…

*मुक्त-मुक्तक : 815 - सायों की तरह से ॥

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भूले से भूखे शेर से गायों की तरह से ॥ घनघोर अंधकार में सायों की तरह से ॥ लगता ज़रूर अजीब है लेकिन है हक़ीक़त , मिलता है अपनों से वो परायों की तरह से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 814 - नर्म बिस्तर पर

नर्म बिस्तर पर बदलते करवटें रातें हुईं ॥ कहने को उनसे कई लंबी मुलाकातें हुईं ॥ कब बुझाने प्यास को या सींचने के वास्ते ? सिर्फ़ सैलाबों के मक़सद से ही बरसातें हुईं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 813 - गुसल करते हैं ॥

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ख़ूब आहिस्ता चुपके-चुपके सम्हल करते हैं ॥ अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़ीस्त अजल करते हैं ॥ एक बोतल शराब हम कभी कभी पीकर , वो तो इंसाँ के खूँ से रोज़ गुसल करते हैं ॥ ( आहिस्ता=धीरे , ज़ीस्त=जीवन ,अजल=मृत्यु ,गुसल=स्नान ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 180 - क्यों मैं सोचूँ ?

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क्यों मैं सोचूँ दौर मेरा थम गया है ? खौलता लोहू रगों में जम गया है ॥ खिलखिलाते उठ रहे हैं सब वहाँ से , जो भी आया वो यहाँ से नम गया है ॥ इक शराबी से ही जाना राज़ ये , मैक़शी से कब किसी का ग़म गया है ? चोरियाँ चुपचाप करते हैं सभी , दिल चुराकर वो मेरा छम-छम गया है ॥ इसमें क्या हैरानगी की बात जो , शह्र में जाकर गँवार इक रम गया है ? उसका जीने की तमन्ना में ही सच , जितना भी बाक़ी बचा था दम गया है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 812 - कब मिटाती हैं मुझे ?

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ग़मज़दा हरगिज़ नहीं ये मुझको करतीं शाद हैं ॥ कब मिटाती हैं मुझे ? करतीं ये बस आबाद हैं ॥ कौन कहता है कि मेरा रहनुमा कोई नहीं ? मुझको मेरी ठोकरें सबसे बड़ी उस्ताद हैं ॥ ( शाद=प्रसन्न ,रहनुमा=पथप्रदर्शक ,उस्ताद=गुरु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति