*मुक्त-मुक्तक : 811 - दाँव पर लगाया है ॥




पैर नीचे की जमीं भर को पूरा का पूरा ,
सर की छत आस्माँ को दाँव पर लगाया है ॥
ज़िंदा रहने को लोग क्या नहीं किया करते ?
हमने मरने को जाँ को दाँव पर लगाया है ॥
ठीक है ये या ग़लत ये तो रब ही जाने मगर
इतना अहसास है कि हमने अपनी मंज़िल को ,
दाँव पे ख़ुद को तो लगाया ही लगाया सँग –
बेगुनह कारवाँ को दाँव पर लगाया है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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