*मुक्त-मुक्तक : 805 - मेरे घर अब नहीं आते ॥


बुलाए बिन चले आते थे वो पर अब नहीं आते ॥
निमंत्रण भेजने पर भी मेरे घर अब नहीं आते ॥
मैं पहले की तरह दाने बिखेरे रोज़ बैठूँ पर ,
न जाने क्यों मेरी छत पर कबूतर अब नहीं आते ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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