*मुक्तक-मुक्तक : 803 - आज मिर्च से पिसते ?



नर्म चिकनाई को पैरों से रौंदने वाले ,
आज अपने कपोल रेग्माल पर घिसते ॥
तोड़ते - फोड़ते सबको जो हथौड़े , कैसे
वक़्त की चक्कियों में आज मिर्च से पिसते ?
बहतीं कल-कल ठुमकती चलतीं स्वच्छ नदियों पर ,
जो बनाते थे ऊँचे - ऊँचे बाँध पर्वत से ,
आज अपने ही मरुस्थल , प्रगाढ़ दलदल में
धँसके आँखों से लगातार लहू से रिसते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-02-2016) को "घिर आए हैं ख्वाब" (चर्चा अंक-2244) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत शुक्रिया ! शास्त्री जी !

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे