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Showing posts from February, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 811 - दाँव पर लगाया है ॥

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पैर नीचे की जमीं भर को पूरा का पूरा , सर की छत आस्माँ को दाँव पर लगाया है ॥ ज़िंदा रहने को लोग क्या नहीं किया करते ? हमने मरने को जाँ को दाँव पर लगाया है ॥ ठीक है ये या ग़लत ये तो रब ही जाने मगर इतना अहसास है कि हमने अपनी मंज़िल को , दाँव पे ख़ुद को तो लगाया ही लगाया सँग – बेगुनह कारवाँ को दाँव पर लगाया है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 810 - किसकी है वह ?

मूर्ति मन मंदिर में मेरे माप की बैठी रही ॥ चाहता था जैसा मैं उस नाप की बैठी रही ॥ पूछते हो किसकी है वह ? और किसकी हो सके ? आप की बस आप की बस आप की बैठी रही ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 809 - उकड़ूँ बैठकर ॥

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बिन कोई बल खाये या रस्सी के जैसा ऐंठकर ॥ हाँ खड़े रहकर , पड़े रहकर या उकड़ूँ बैठकर ॥ है बड़ा तू तो रहे , मैं क्या करूँ ऐ पत्रकार ? सर्वथा मेरे निजी जीवन में मत घुसपैठकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 808 - धूल - मिट्टी की जगह......

धूल - मिट्टी की जगह सीम या ज़र हो जाता ॥ तुच्छ झींगे से मगरमच्छ ज़बर हो जाता ॥ ख़ुद को महसूस हमेशा ही तो नाचीज़ किया , अपने कुछ होने का अहसास अगर हो जाता ॥ ( सीम या ज़र = सोना या चाँदी , ज़बर = शक्तिशाली ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 807 - दो बूँद जल दे दे ॥

लगाते दौड़ चूहे पेट में  बस एक फल दे दे ॥ न दे खाने को पीने के लिए  दो बूँद जल दे दे ॥ अशक्त होकर पड़ा हूँ भूमि पे यों  जैसे कोई शव , न कर कुछ मुझको उठ भर जाऊँ  तू बस इतना बल दे दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति


*मुक्त-मुक्तक : 806 - शराफ़त का लिबास

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हमने जैसे ही पहना नेकी-शराफ़त का लिबास , दुनिया बदमाशियों पे हो गई उतारू सब ॥ हमने ज्यों ही उतारा मैक़शी के दामन को , लोग पीने लगे बग़ैर प्यास दारू सब ॥ उनको कहते हैं लोग शहर का बड़ा नेता - सिर पे टोपी लपेटते गले में वो मफ़लर , हम जो दफ़्तर में सैंडलपहन के क्या पहुँचे , उसको कहने लगे फटाक से गँवारू सब !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 805 - मेरे घर अब नहीं आते ॥

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बुलाए बिन चले आते थे वो पर अब नहीं आते ॥ निमंत्रण भेजने पर भी मेरे घर अब नहीं आते ॥ मैं पहले की तरह दाने बिखेरे रोज़ बैठूँ पर , न जाने क्यों मेरी छत पर कबूतर अब नहीं आते ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 804 - तू मिसरी कर दे ॥

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जलेबियों को सरल रेख सी सीधी कर दे ॥ करेलों-नीमों-मिर्चियों को तू मिसरी कर दे ॥ नहीं है मुझमें कुछ ऐसा जो भाए दुनिया को , मेरी चुड़ैल सी ये ज़िंदगी परी कर दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्तक-मुक्तक : 803 - आज मिर्च से पिसते ?

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नर्म चिकनाई को पैरों से रौंदने वाले , आज अपने कपोल रेग्माल पर घिसते ॥ तोड़ते - फोड़ते सबको जो हथौड़े , कैसे वक़्त की चक्कियों में आज मिर्च से पिसते ? बहतीं कल-कल ठुमकती चलतीं स्वच्छ नदियों पर , जो बनाते थे ऊँचे - ऊँचे बाँध पर्वत से , आज अपने ही मरुस्थल , प्रगाढ़ दलदल में – धँसके आँखों से लगातार लहू से रिसते ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति