*मुक्त-मुक्तक : 800 - ठंडों में गरम कम्बल देना ॥




जब प्यास से गर्मी में तड़पूँ ,
तब शीतल-शीतल जल देना ॥
तुम भेंट के इच्छुक हो तो मुझे ,
ठंडों में गरम कम्बल देना ॥
उपहार वही मन भाता है जो ,
हमको आवश्यक होता है ;
अतएव मेरी तुम चाह समझ -
वह आज नहीं तो कल देना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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