*मुक्त-मुक्तक : 799 - क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥




 आज फिर मुझको क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥
शुष्क वस्त्रों को गीला करेगी प्रिये ॥
भूल मैं जो गया आज छतरी कहीं ,
आज बरसात होकर रहेगी प्रिये ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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