*मुक्त-मुक्तक : 798 - कौआ समझते थे ॥



चंद्रमा को एक जुगनूँ सा समझते थे ॥
श्वेतवर्णी हंस को भँवरा समझते थे ॥
आज जाना जब हुआ वो दूर हमसे सच ,
स्वर्ण-मृग को हम गधे कौआ समझते थे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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