*मुक्त-ग़ज़ल : 178 - नाच मटक-टूट गए ॥



तुम जनाज़ों को काँधा देते सटक-टूट गए ॥
हम बरातों में नाच-नाच मटक-टूट गए ॥
हम जो लोहे से भी मज़बूत थे शीशे की तरह ,
तेरे जाने के बाद फूट चटक-टूट गए ॥
रहनुमाई में तेरी मंज़िलें फ़तह कीं सभी ,
अपनी अगुवाई में सब भूल भटक-टूट गए ॥
भूलकर भी जो न बीमार हुए इक तरफ़ा ,
इश्क़ में पड़ के बुरी तरह झटक-टूट गए ॥
अपनी औलाद से अपने ही लिए सुन गाली ,
सर को पत्थर पे नारियल सा पटक-टूट गए ॥
पूरा हाथी निकालने तलक सलामत थे ,
इक अकेली क्या गई पूँछ अटक-टूट गए ॥
पैर धरती पे कहीं रखने जब मिली न जगह ,
लोग चमगादड़ों के जैसे लटक-टूट गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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