*मुक्त-ग़ज़ल : 177 - छूट-छूट के ॥

      

     दिल में जो मेरे ग़म भरा है
     कूट-कूट के
     रो-रो उसे निकाल दूँगा
     फूट-फूट के
     मेरा तो क्या किसी का हो
     सके न जो कभी ,
     मेरा उसी से दिल लगा रे
     टूट-टूट के
     हाथ आए थे मुश्किल से जो सब
     मुझको काट-काट ,
     वो फड़फड़ा उड़े रे तोते
     छूट-छूट के
     जो-जो जमा किया था बैरी
     सब तो ले गया ,
     कुछ माँग-माँग के तो कुछ को
     लूट-लूट के
     मत पूछ जबसे मैं जुड़ा हूँ उससे
     किस क़दर ,
     करता हूँ एक तरफ़ा प्यार
     टूट-टूट के ?
     कब तक जिऊँगा मैं जो रोज़-
     रोज़ आएगी ,
     याद उसकी मेरे दिल का गला
     घूट-घूट के ?

   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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