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Showing posts from January, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 802 - नग्नाटक ॥

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दे चुका जीवन का मैं हर मूल्य हर भाटक ॥ जबकि मुझ पर खुल रहा अब मृत्यु का फाटक ॥ वस्त्र - आभूषण से रहता था लदा कल तक , आज गलियों में मैं घूमूँ बनके नग्नाटक ॥ ( भाटक=किराया ,फाटक=द्वार ,नग्नाटक=सदा नंगा घूमने वाला साधु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 801 - अमरबूटियाँ

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कौन यह जानता नहीं कि काया नश्वर है ? सबका जीवन यहाँ पे जल का बुलबुला भर है ॥ फिर भी क्यों स्वप्न सँजोता है सदियों सदियों के , जैसे आया वो अमरबूटियाँ गुटक कर  है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 800 - ठंडों में गरम कम्बल देना ॥

जब प्यास से गर्मी में तड़पूँ , तब शीतल-शीतल जल देना ॥ तुम भेंट के इच्छुक हो तो मुझे , ठंडों में गरम कम्बल देना ॥ उपहार वही मन भाता है जो , हमको आवश्यक होता है ; अतएव मेरी तुम चाह समझ - वह आज नहीं तो कल देना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

नवगीत : 41 - मैं क्यों कवि बन बैठा ?

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कई प्रश्न स्वयं के अनुत्तरित – इक यह कि मैं क्यों कवि बन बैठा ? बाहर चहुंदिस वह चकाचौंध । आकाश-तड़ित सी महाकौंध । प्रत्येक उजालों का रागी , जुगनूँ तक पे सब रहे औंध । यद्यपि मैं पुजारी था तम का , क्या सोच के मैं रवि बन बैठा ? नकली से सदा अति घृणा रखी । परछाईं स्वयं की भी न लखी । झूठों से बराबर बैर रहा , कभी भूल न पाप की वस्तु चखी । क्या घटित हुआ कि मैं जीवित ही , कहीं मूर्ति कहीं छवि बन बैठा ? कब धर्म पे था विश्वास मुझे ? कब होम-हवन था रास मुझे ? जप-तप-पूजन लगते थे ढोंग , लगते थे व्यर्थ उपवास मुझे । क्यों यज्ञ में तेरी सफलता के , मैं स्वयं पूर्ण हवि बन बैठा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 799 - क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥

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आज फिर मुझको क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥ शुष्क वस्त्रों को गीला करेगी प्रिये ॥ भूल मैं जो गया आज छतरी कहीं , आज बरसात होकर रहेगी प्रिये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 179 - पिलाने का हुनर ॥

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प्यास को पानी बग़ैर हमने बुझाने का हुनर ॥ ग़मज़दा रह रह के सीखा मुस्कुराने का हुनर ॥ पाके खो देने के फ़न में सब ही हैं माहिर यहाँ , इश्क़ ने हमको बताया खो के पाने का हुनर ॥ सब ही पीते हैं शराबें ढालकर इक जाम में , उसने आँखों से दिखाया है पिलाने का हुनर ॥ सब कमाना चाहते हैं हाँ मगर अफ़्सोस ये , सब को कब आता है दुनिया में कमाने का हुनर ? मत कुछ ऐसा कर कि अपने मानकर चल दें बुरा , रूठना आसाँ है मुश्किल है मनाने का हुनर ॥ अब मोहब्बत की तिजारत में है लाज़िम सीखना , बेवफ़ाओं को तहेदिल से भुलाने का हुनर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 798 - कौआ समझते थे ॥

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चंद्रमा को एक जुगनूँ सा समझते थे ॥ श्वेतवर्णी हंस को भँवरा समझते थे ॥ आज जाना जब हुआ वो दूर हमसे सच , स्वर्ण-मृग को हम गधे कौआ समझते थे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 797 - चलने की तैयारियाँ ॥

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ख़ुद ख़रीदी हैं जाँसोज़ बीमारियाँ ॥ हो रहीं पुख्ता चलने की तैयारियाँ ॥ तब पता ये चला फुँक चुका जब जिगर , जाँ की क़ीमत पे कीं हमने मैख़्वारियाँ ॥ ( जाँसोज़=जाँ को जलाने वाली ,मैख़्वारियाँ=शराबखोरी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 178 - नाच मटक-टूट गए ॥

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तुम जनाज़ों को काँधा देते सटक-टूट गए ॥ हम बरातों में नाच-नाच मटक-टूट गए ॥ हम जो लोहे से भी मज़बूत थे शीशे की तरह , तेरे जाने के बाद फूट चटक-टूट गए ॥ रहनुमाई में तेरी मंज़िलें फ़तह कीं सभी , अपनी अगुवाई में सब भूल भटक-टूट गए ॥ भूलकर भी जो न बीमार हुए इक तरफ़ा , इश्क़ में पड़ के बुरी तरह झटक-टूट गए ॥ अपनी औलाद से अपने ही लिए सुन गाली , सर को पत्थर पे नारियल सा पटक-टूट गए ॥ पूरा हाथी निकालने तलक सलामत थे , इक अकेली क्या गई पूँछ अटक-टूट गए ॥<

*मुक्त-ग़ज़ल : 177 - छूट-छूट के ॥

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दिल में जो मेरे ग़म भरा है      कूट-कूट के ॥      रो-रो उसे निकाल दूँगा      फूट-फूट के ॥      मेरा तो क्या किसी का हो      सके न जो कभी ,      मेरा उसी से दिल लगा रे      टूट-टूट के ॥      हाथ आए थे मुश्किल से जो सब      मुझको काट-काट ,      वो फड़फड़ा उड़े रे तोते      छूट-छूट के ॥      जो-जो जमा किया था बैरी      सब तो ले गया ,      कुछ माँग-माँग के तो कुछ को      लूट-लूट के ॥      मत पूछ जबसे मैं जुड़ा हूँ उससे      किस क़दर ,      करता हूँ एक तरफ़ा प्यार      टूट-टूट के ?      कब तक जिऊँगा मैं जो रोज़-      रोज़ आएगी ,      याद उसकी मेरे दिल का गला      घूट-घूट के ?
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 796 - उड़ते अपनी शान से ॥

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आस्माँ पर सब परिंदे  उड़ते अपनी शान से ॥ मछलियाँ पानी में तैरें  इक अलग ही आन से ॥ दौड़ें , कूदें , नृत्य भी हैं  केंचुवी इंसान के , चल सकेगा क्या कभी ये  पूरे इत्मीनान से ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति